कविता : अब तो परिवार भी खानदानी नहीं लगता 

कविता : अब तो परिवार भी खानदानी नहीं लगता 

याद आ रहा है बचपन ।
बालू के ढेर में खेलना।।
दौड़ना उछलना और कूदना ।
शाम को पुलिया पर बैठना।।
दोस्तों के संग मंदिर जाना।
दुकानों को देख कविता बनाना।।
दोस्तों संग कुएं से पानी भर के लाना ।
पड़ोसियों के दरवाजों में फूल बनाना ।।
घर के ऊपर से निकली हुई
केबिल में अपना तार फंसाना ।
तार उस में फंसा कर
अपनी टीवी चलाना ।।
ब्लैक एंड व्हाइट टीवी में फिल्म देखना ।
रेडियो में आकाशवाणी सुनना ।।
सुबह चार बजे उठ जाते थे हम ।
टीवी या रेडियो में लग जाते थे हम ।।
पांच बजे उठकर दादी चकिया चलाया करती थी।
और हम रेडियो में विविध भारती सुना करते थे ।।
क्या जमाना था सब लोग मिलकर रहते थे।
चाचा बाबा दाई भाई माता पिता, सब के सब हंसकर रहते थे ।।
मगर आज सब के सब अलग हो गए हैं ।
सबके अपने अपने घर हो गए हैं ।।
अब तो सब के सब लोग झगड़ते रहते हैं ।
तिनका तिनका जमीन के लिए लड़ते रहते है ।।
अब कोई भी किसी पर मेहरबानी नहीं रखता।
ऐसे में परिवार भी अब खानदानी नहीं लगता ।।

लेखक कवि एवं गीतकार –
जीतेन्द्र कानपुरी ( टैटू वाले)

 

 

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