राष्ट्र हित में कवि जीतेन्द्र कानपुरी की कविता

राष्ट्र हित में कवि जीतेन्द्र कानपुरी की कविता

( विश्वाश )

कर “विश्वाश” निकलता चल
रुक मत कहीं भी, चलता चल ।
तलाश तुम्हारी पूरी होगी
बस आगे को बढ़ता चल ।।
मन को मजबूत धागे में बांध
पतंग की तरह उड़ता चल ।
जैसे पानी आग में उबले
तू जिद में अपनी उबलता चल ।।

“विश्वास” नहीं खोने देना
निराश नहीं होने देना ।
खुद को कंटक पर चढ़ते
हताश नहीं होने देना ।।
समय आएगा अवश्य आएगा ।
बस इतना तू जान ले ।
तू जीतेगा, कर “विश्वाश”
बस इतना तू मानले ।।

“विश्वाश” के रास्ते बना लो
मंजिलें मिल जाएंगी ।
मंजिलें न भी दिखें
पर दूरियां घट जाएंगी ।।
हो अटल “विश्वाश” पक्का
नजदीकियां आ जाएंगी ।
हर पग में ऐसा दम होगा
कि जमीन भी हिल जाएगी ।।

लेखक कवि एवं कहानीकार –
जीतेन्द्र कानपुरी (टैटू वाले)
9118837179

administrator

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *